Sunday, October 9, 2016

सपनों के लौटने का इंतज़ार !

अब जबकि किनारों पे तेरे क़दमों के निशां खोजने छोड़ दिए हैं मैंने, 
ढलते सूरज के नीचे बैठ तेरा इंतज़ार भी नहीं होता !
अब न सुबह होती है तेरी मुस्कराहट से, 
न रात तेरी हंसी से रौशन!
बेवजह मैं भी अब परेशां नहीं होता
बेवजह तेरा भी दिल नहीं धड़कता!
मैंने भी कागजों की नाव बनाना छोड़ दिया है,
तेरा भी पैरहन अब कागजी नहीं!
मिट जाने का जज्बा न मेरे दिल मैं है,
कुर्बान होने की चाहत तेरे जिस्म में भी नहीं!
तेरी किस्मत मैं है अब पतझड़ का जर्द रंग,
मेरी बाँहों में मनहूसियत की गर्मी,
मैं अपने दिल को अपनी बाँहों में सम्हाल सकता हूँ,
तू भी अपनी आँखों में दोजख छुपा सकती है! 
मेरी कामयाबी के हारों में तेरे फूल की खुशबू नहीं,
तेरी भी हंसी में मेरे दिल का उजाला नहीं,
नादान दिलों को अब जमाने ने समझदार बना दिया है,
पर समझदार होकर भी यह नासमझी क्यों बाकी है?
क्यों हर शाम मुझे तेरी याद में डुबाती है ?
----------- प्रशांक चंद्रा
             ०९.१०.२०१६
 

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