आज पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए
एहसास हुआ है कि मैंने खवाइश न की थी,
सूरज निगल जाने की,
तारे तोड़ के लाने की,
मैंने चाँद भी न माँगा था !
मैं बस एक फूल तेरे बालों में लगाना चाहता था,
फूल जो की तेरे सर्पीले बालों में रात दिन महकता!
मैंने सपनो में बादलों की गठरी बनाकर तेरे गेसुओं में डाली थी
मैं कायनात से तुझे मांग भी न पाया,
मैं तो रोमांचित था तेरे नाम से,
तेरे रूप से, तेरी मुस्कान से,
क़ि मैं तुझे बस छूना चाहता था!
मेरी किस्मत में लेकिन तेरे हाथों की हल्दी का दाग लग गया!
आज पुरानी डायरी के पन्नों पर इस दाग का पीलापन फिर उभर आया है !
दाग सूरज सा चमक रहा है और मैं
निस्तेज दिए सा फड़फड़ाने लगा हूँ!
-प्रशांक चंद्रा
16.10.16
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