Saturday, October 15, 2016

पुरानी डायरी के पन्नों पर

पुरानी डायरी के पन्नों पर


आज पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए
एहसास हुआ है कि मैंने खवाइश न की थी,
सूरज निगल जाने की,
तारे तोड़ के लाने की,
मैंने चाँद भी न माँगा था !

मैं बस एक फूल तेरे बालों में लगाना चाहता था,
फूल जो की तेरे सर्पीले बालों में रात दिन महकता!
मैंने सपनो में बादलों की गठरी बनाकर तेरे गेसुओं में डाली थी
मैं कायनात से तुझे मांग भी न पाया,
मैं तो रोमांचित था तेरे नाम से,
तेरे रूप से, तेरी मुस्कान से,
क़ि मैं तुझे बस छूना चाहता था!
मेरी किस्मत में लेकिन तेरे हाथों की हल्दी का दाग लग गया!
आज पुरानी डायरी के पन्नों पर इस दाग का पीलापन फिर उभर आया है !
दाग सूरज सा चमक रहा है और मैं
निस्तेज दिए सा फड़फड़ाने लगा हूँ!

-प्रशांक चंद्रा
16.10.16


 

   

Sunday, October 9, 2016

सपनों के लौटने का इंतज़ार !

अब जबकि किनारों पे तेरे क़दमों के निशां खोजने छोड़ दिए हैं मैंने, 
ढलते सूरज के नीचे बैठ तेरा इंतज़ार भी नहीं होता !
अब न सुबह होती है तेरी मुस्कराहट से, 
न रात तेरी हंसी से रौशन!
बेवजह मैं भी अब परेशां नहीं होता
बेवजह तेरा भी दिल नहीं धड़कता!
मैंने भी कागजों की नाव बनाना छोड़ दिया है,
तेरा भी पैरहन अब कागजी नहीं!
मिट जाने का जज्बा न मेरे दिल मैं है,
कुर्बान होने की चाहत तेरे जिस्म में भी नहीं!
तेरी किस्मत मैं है अब पतझड़ का जर्द रंग,
मेरी बाँहों में मनहूसियत की गर्मी,
मैं अपने दिल को अपनी बाँहों में सम्हाल सकता हूँ,
तू भी अपनी आँखों में दोजख छुपा सकती है! 
मेरी कामयाबी के हारों में तेरे फूल की खुशबू नहीं,
तेरी भी हंसी में मेरे दिल का उजाला नहीं,
नादान दिलों को अब जमाने ने समझदार बना दिया है,
पर समझदार होकर भी यह नासमझी क्यों बाकी है?
क्यों हर शाम मुझे तेरी याद में डुबाती है ?
----------- प्रशांक चंद्रा
             ०९.१०.२०१६
 

एक नव ब्राह्मण की बेचैनी !

 
पता रहना चाहिए मुझे तुम्हारी जाति,
नहीं तो तुम्हारी पॉलिटिक्स पता नहीं चलती!
होने लगता हूँ मैं बैचैन! निहायत ही बैचैन! 
जब नहीं पता लगा पाता मैं तुम्हारे नाम से तुम्हारी जाति का पता !I
बस अपने जैसे जानवरों के समूह में ही मैं खुश हूँ 
क्योंकि यही सीखा है मैंने "उन" जानवरों से जोकि जन्मना सदियों तक सम्मानीय रहे !
रौंद डाला था जिन्होंने करोड़ों लोगों का सम्मान!
मैं अब बिलकुल उनके जैसा हूँ, बस देखता हूँ कि मैं और मेरा कबीला खुश रहे!
मिलती रहे मेरे हाथी को हरी घास!
और रहें मेरे अपने ही मेरे आस पास!
क्योंकि मैंने मान लिया है (जैसा कि उन्होंने माना था) कि
जन्म कुल ही सफलता कि कुंजी है मेरे भारत महान में!
इसीलिए ऐ दोस्त ! मुझ नव ब्राह्मण पर तरस खाओ ! और प्लीज 
अपने नाम से अपनी जाति कि प्रतीति अवश्य कराओ !