बचपन में एक किताब ने बहुत प्रभावित किया था- नाम था "हमारे वैज्ञानिक" । आज तक उस पुस्तक की याद है...पुरानी किताबो की भीड़ में पता नहीं कहाँ खो गयी...लेकिन ज़िन्दगी में वैज्ञानिक बनने की तमन्ना पैदा कर गयी..यह अलग बात है की बन कुछ नहीं पाया...उन स्कूली दिनों में अपने को वैज्ञानिक से कम नहीं समझते थे । वोह तमन्ना तो अधूरी रह गयी..दूसरी बहुत सी तम्मनाओं के साथ, लेकिन एक चीज़ है जो हर वैज्ञानिक की जड़ में होती है और वो है..प्रयोग करने की आदत...और प्रयोग अपन ने बहुत किये..यहाँ तक की ज़िन्दगी एक प्रयोग बन के रह गयी। जो नहीं बनना था वो बन गए...और जो बनना था वो पीछे ही छूट गया...इस पोस्ट का शीर्षक देते वक्त ग़ालिब का यह शेर याद आ गया की...कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा!
उदारीकरण ने और कुछ किया हो या न किया हो..अपने जैसे आदमी को जिंदा रहने का ज़रिया दे दिया..नहीं तोह आज यह सोच के ही दम निकलता है की हिंदुस्तान की जुगाड़ कल्चर में फिट होने में अपने को बहुत प्रॉब्लम आती और शायद एक जॉब के भी लाले पड़ जाते ।
ज्यादा दिमाग में आज कुछ आ नहीं रहा है..ग़ालिब के शब्दों को उधार लेकर..अपनी दफन हुई बहुत सी तमन्नाओं में से एक को पेश करके ब्लॉग ख़त्म करता हूँ...
रहिये अब ऐसी जगह, चलकर जहाँ कोई न हो
हम सुख़न कोई न हो और हम्ज़बाँ कोई न हो
बे दर\-ओ\-दीवार स एक घर बनाया चाहिये
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जायें तो, नोहाख़्वाँ कोई न हो!
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